Published Article / वंशवाद का प्रजातंत्र
वंशवाद का प्रजातंत्र
देश के पहले प्रधानमंत्री बनने का गौरव प्राप्त हुआ श्री जवाहरलाल नेहरु जी को और फिर उनके उपरान्त श्री लाल बहादुर शास्त्री को। लेकिन वक़्त के बदलते ही इस प्रजातंत्र प्रणाली का अस्तित्व धूमिल होने लगा। नेता खुद ही फैसला करने लगे की अगला उम्मीदवार कौन होगा और फिर शुरू हो गयी हर क्षेत्र में अपने वर्चस्व को बढ़ावा देने की होड़। 80 के दशक के बाद तो भाई-भतीजावाद इस क़दर हावी हुई की लगने लगा जनता अब सिर्फ मूक दर्शक का किरदार निभाने के लिए है। श्रीमती इंदिरा गाँधी के समय और फिर उनके बाद भी उन्ही के दोनों बेटों को जनता के सामने लाया गया। इसके बाद भी उन दोनों के पत्नी, बेटे और बेटियों को ज़बरदस्ती जनता पर थोपा जाने लगा। जिसका नतीजा यह हुआ की बाकि के अन्य नेता भी इस दौड़ में शामिल हो गए। सिंधिया परिवार के बाद पायलट परिवार और अब यादव परिवार भी शामिल है। अब हर राजनितिक दल के हर नेता वंशवाद के रंग में रंगे हुए नज़र आते है। गौरतलब बात है की जितने भी उम्रदराज़ नेताओं के सुपुत्र हुए है उनमे से न तो किसी ने भी कोई उपलब्धि हासिल किये और न ही जनता का विश्वास मत हासिल कर पाए। सबसे ताज्जुब की बात है कि उन्हें युवा नेताओं की श्रंखला में रखा जाता है।
कहने को तो अपने देश में प्रजातंत्र की व्यवस्था भले ही निश्चित रूप से है लेकिन वह वंशवाद के चाबुक से हाँकी जाती है। हर नेता जो पहले जनता प्रतिनिधि होता है, सत्ता मिलते ही अपने घर-परिवार के लोगों को ऊँचे ओहदे पर आसीन करवाने की जद्दोजहद में लग जाते है। यह भाई-भतीजावाद की कवायद सिर्फ राजनीती तक ही सीमीत नही है, इसका कारवां तो अब निजी संस्थाओं में भी घर कर चुका है। हर ओहदे पर रिश्तेदारों की सिफ़ारिश पर योग्यता को दरकिनार किया जाता है और स्वार्थ व्यवस्था को बढ़ावा दिया जाता है। नतीजतन न तो देश उन्नति की तरफ है न ही उद्योग-धँधे क्यूंकि सब अपने घर को भरने के चक्कर में उचित मार्ग से भटक कर देश की व्यवस्था को खोखले किये जा रहे है।
जनता अपना नेता चुनती है इस विश्वास से कि हमारा प्रतिनिधि हमारे लिए कुछ करेगा लेकिन अफ़सोस होता है ठीक इसके विपरीत। सत्तारूढ़ होते ही नेतागण अपना रंग बदल लेते है और हर काम अपने चापलूसों के अनुसार करते है। अपना घर भरने और अपनी निजी कमाई के लिए हर ऊँचे ओहदे पर अपने खासमखास को अपने वर्चस्व से नियुक्त कराये जाते है और यही वजह भी है कि अपने देश से भ्रष्टाचार ख़त्म होने का नाम नही ले रही है। दल के प्रमुख खुद ही तय कर लेते है की अगला प्रतिनिधि कौन होगा और अधिकतर वह उनके करीबी होते है। दल के कार्यकर्ता भी अपना मतलब सीधा करने के लिए हाँ में हाँ मिलाते रहते है। बड़ी बात यह भी है की फिर जनता को चुनने का हक कहाँ मिला क्यूंकि उसको वही प्रतिनिधि थोपा जा रहा जिसे राजनितिक दल क़ाबिल समझ रहे है, फिर किस बात की प्रजातंत्र व्यवस्था? पीढ़ी दर पीढ़ी हर दल में ऐसे ही कोई रिश्तेदार आगे आते रहेंगे और वंशवाद चलता जायेगा फिर बदलाव कब आयेगा?
यह वंशवाद कुछ ऐसी है जैसे आदिकाल में किसी राज्य का राजा अपना उत्तराधिकारी खुद चुनता था और अपनी संतान को गद्दी सँभालने की ज़िम्मेदारी देता था और प्रजा उसे स्वीकारती भी थी। मतलब क्या हम उस काल की तरफ रुख कर रहे है? फिर तो यह व्यवस्था बंद करनी चाहिए और शासकीय व्यवस्था लानी चाहिए, आखिर मुग़ल काल में भी यही होता था। अगर वंशवाद के अनुसार ही देश चलाना है तो फिर क्या ज़रूरत है इतने नेताओं और राजनितिक दल की? फिर क्या ज़रूरत वोट की राजनीती का? अगर गौर करे तो यह वंशवाद सीधा संविधान का अपमान करती है क्यूंकि हम नेता जो चुनते है देश के लिए, वो हमें विकल्प के तौर पर हर राजनितिक दल अपने अनुसार और अपनी पसंद के हिसाब से हमारे सामने ले आते है। यही वजह है की चुनाव के बाद जब कोई नेता किसी जनता पर अत्याचार करते रहते है तो कानून भी कुछ नही करता क्यूंकि वहां भी उनके अपने ही लोग होते है। फिर जनता को समझ आता है की कैसे उसने अपने ही राज्य को चौपट राजा के हाथों में सौंप कर पुरे राज्य को अंधेर नगरी में तब्दील कर दिया।
जिस रफ़्तार से हर राजनितिक दल वंशवाद को परंपरा के रूप में अपना रही है वह दिन दूर नही जब हर नेता एक दुसरे के रिश्तेदार नज़र आयेंगे और जनता के पास कोई नेता चुनने का विकल्प नही रह जायेगा। इस तरह तो हर नेता अपने घर से एक जनता प्रतिनिधि को पैदा करते रहेंगे और जनता का काम रहेगा उनका भरण-पोषण करना क्यूंकि जनता से वसूली गयी आमदनी तो नेताओं के निजी खाते में ही जाएगी। वक़्त आ गया है की चुनाव आयुक्त को इस तरफ ध्यान देना चाहिए और कोशिश करनी चाहिए की, जो नेता पिछले 10 वर्षों से किसी पद पर आसीन थे तो कम से कम उनके निजी परिवार वाले को अगले 10 साल तक, चुनाव में खड़ा न होने दिया जाये ताकि जनता पर किसी भी प्रकार का दबाव न आये और न ही कोई गलत तरीके से प्रभावित करे।
एक बेहतर समाज और एक बेहतर प्रजातंत्र देश के लिए कुछ बदलाव की अतिशीघ्र आवश्यकता है, वर्ना फिर देश किस गर्त की तरफ गिरेगा यह कहना उचित नही होगा।
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