बूँद

बूँद।

गीले पत्तों पर थिरक कर जो बूँद गिरी थी अभी अभी, ज़मीं पर कहीं खो गयी थी। देखा तो पत्तों ने भी, बारिश और और उस मिटटी ने भी, लेकिन किसी ने कुछ बताया नहीं। हर ओर बरसात का शोर और उसमें किसी बूँद की आवाज़ कोई कैसे पहचाने... पता नहीं कहाँ खो गयी थी।

बारिश में भीगते हुए उसे भी नहीं पता चला की कब वह आँखों से बहकर कहीं और विलीन हो गयी है। जैसे सब भीगे हुए थे, वह भी कहीं गुम थी.. भिगो कर और भीग कर। बूँद में कितनी पारदर्षिता होती है न, और बारीकी से देखो तो उस बूँद में कितने अक्स नज़र आ जाते है। फिर उसका विलीन होना इतना ज़रूरी क्यों होता है?

कहीं रिसती है, तो कहीं टूटती है.. और ऐसे ही हर बूँद अपना वजूद बना लेती है। यानी की दुरी उसकी नियति होती है, लेकिन ऐसा भी तो हो सकता है कि उसे बहरूपिया बने रहना ही भाता हो। बूँद किसी एक की तो कभी नहीं रहती, सफर के बहाने अपने मायने बदलती रहती है... क़ाफ़िर होती है शायद।

©Abhilekh

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