Khamoshiyon ki baaten...!
खामोशियाँ बेबाक होती है और उदंड भी। संवाद, मन-मर्ज़ियों का फ़रेब ले कर अक्सर एक मोड़ ले लेती है और उड़ेल देती है खामोशी..। शुन्य सी होती है वह ख़ामोशी लेकिन साथ देने की हिम्मत कोई संख्या नहीं जुटा पाती, जिससे की उसकी अहमियत बढ़ जाए। इसलिए , खामोशियाँ एक लम्हे के बाद दम तोड़ देती है।
हलक़ के दोनों सिरे बंधे होते है.. एक दिल से और एक दिमाग से, ऐसे में खामोशियाँ थूक गटक के अपना गुज़ारा करती है। हर बार लफ्ज़ कलाबाज़ी करते हुए ज़हन और दिल को भेदते रहते हैं और खामोशियाँ तरसती रहती है एक ज्वालामुखी के लिए। हालाँकि खामोशियों में उबाल कंजूसी लिए होता है लेकिन उसके असर में अंतराल नहीं होता.. बस सफ़र होता है।
हाँ, ख़ामोशियों की पहचान नाजायज़ सी होती है...अक्सर, मतलब से बेमतलब तक। स्याह हो कर भी फरेबी हो जाती है, अब और क्या कहें... चलो, खामोश ही रह लें।
©Abhilekh
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