खामोश।
ख़ामोश।
न न घबराइए नही, न तो मैं किसी फ़िल्मी शख्सियत के संवादों का बखान करनेवाला हूँ और न ही अपने देश के कर्णधारों के श्लोकों का विश्लेषण करने वाला हूँ। बस इनसे जुड़ी हुई कुछ ऐसी बातें है जो आपसे साझा करना चाहता हूँ।
पिछले कुछ सप्ताहों में चर्चा जो गर्म थी उनमे प्रमुख थी ख़बरों की खरीद-बिक्री और उनकी पक्षपातपूर्ण प्रस्तुति। गौर करने वाली बात यह है कि यह विवाद उठा भी तो चुनाव की गहमा-गहमी को देखते हुए। कुछ दिनों को हो-हल्ला रहा बाद में फ़िर सब पुराने ढर्रे पर आ गए। लेकिन एक बात मेरे दिमाग में गुलाटी मार रही थी कि उनको पैसे दिए किसने और क्यूँ दिए ? जनता तो सदियों से भ्रमित होती आ रही है, फ़िर यह अचानक जनता की भलाई की आड़ में इतना हंगामा क्यूँ खड़ा किया गया ? अगर ख़बर बेबाक़ी से छपे तो उनपर हुक्का-पानी लेकर चढ़ जाते है और अगर न छपे तो उन्हें चोरों की श्रेणी में खड़ा कर दिया जाता है। अगर आप चाहते है कि खबरें सही तरीके से सामने आये तो एक ही नियमवाली में समस्त समाचार पत्रों को बाँधिए और फिर उसी हिसाब से उनपर अँकुश भी लगाइए। हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि बिना पैसे के तो एक परिवार भी नही चलता फ़िर यह तो व्यवसाय भी है। मौजुदा हाल में ख़बरों को लेकर प्रतिस्पर्धा इतनी बढ़ गयी है कि किसी चैनल ने एक पैसे लेकर कोई ख़बर दिखाई है तो दूसरा चैनल उस ख़बर के खंडन हेतु उपाय जोड़ने लगता है। और यह ईमानदारी की मिसाल के लिए नही किया जाता, बस कुछ ज़्यादा पैसों के लिए होता है और इसी बहाने ख़ुद को जनता के बीच में ईमानदार साबित कर लेते है। TRP की क़वायद ऐसी है कि हर ख़बर में चीर-फाड़ कर के उनमें मसाला भरा जाता है। मसलन पाठक/दर्शक भले दाल-रोटी वाला हो लेकिन उसकी थाली में जबरन बोटी परोसेंगे। और ऐसा होता है कुछ ख़ास मक़सद के लिए, तो कयूँ न कुछ सख्त नियम-कानून बनाये जाएँ और ख़बरों पर भी नज़र रखा जाए।
लेकिन ताज्जुब तब होता है जब नेतागण खबरों और उनके माध्यमों को लेकर सिरफिरा रवैया अपनाते है। ख़ुद तो प्रेस कांफ्रेंस या रैलियों में गला फाड़ कर गाली-गलौज करते है और विवाद होने पर या तो सफ़ाई देंगे नही तो दोष देंगे की उनके कथन को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया है। हालाँकि कभी-कभी इन नेताओं और समाचारों की स्तिथि तब हास्यास्पद सी लगती है जब नेताओं के कहे गए अपशब्द को टीवी पर नही सुनाते वहीँ समाचार पत्रों में छप जाते है। इसका मज़ा सोशल नेटवर्किंग साईट पर बख़ूबी देखने को मिलता है। अब इस बात से तो यह भी तैय हो जाता है कि प्रेस मिडिया में ख़ुद कोई पारदर्शिता नही है, तभी तो जिसको जो मन करता है अपने हिसाब से खबरों को परोस देते है। हाँ एक बात और यह है कि नेताओं को इनपर कोई आपत्ति नही जताना चाहिए क्यूँकी वह लोग तो खुद अपनी अभद्दत्रता से कभी संसद तो कभी देश का अपमान करते रहते है। जिनके गिरेबां में ख़ुद 72 छेद है पहले वह ख़ुद को सम्भाले फ़िर दूसरों पर दोष डालें।
माहौल देखते हुए कुछ पंक्तियाँ कहना चाहूँगा:
इस चुनावी वसंत में सभी रंगीन हो गए है,
किसी की शक्ल काली तो किसी के हाथ लाल हो गए है।
देश के कर्णधारों की गला-फाड़ प्रतिस्पर्धा में,
जनता भी काम छोड़ रोज़ मुफ़्त में तमाशबीन हो गए है।
इस मौसम का असर तो वक़्त आने पर दिखेगा,
फ़िलहाल पिछले वादों का जनाज़ा याद कर थोड़े गमगीन हो गए है।
खैर.....
फ़िलहाल, मस्त रहिये और खबरों पर नज़र रखिये लेकिन अंधविश्वास न पालें।
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