Story: अपशकुन।

सीता: रघुवर, आपके मन में कहीं यह संदेह तो नहीं, कि मेरा आपकी ज़िन्दगी में आना तमाम कठिनाईयों और परेशानी की कारण हूँ, मेरा मतलब यह है कि कहीं मैं आपके जीवन में किसी अपशकुन की तरह तो नहीं हूँ न?

सीता ने फलों को धोते हुए सवाल तो किया था लेकिन उसने बिना नज़र मिलाए ऐसे प्रश्न किया था, जिसपर प्रभु राम को आश्चर्य भी था और संदेह भी। वह बाणों को व्यस्थित कर सीधे सीता के करीब आ खड़े हुए। कुछ पल के मौन के बाद सवाल किया, " तुम्हे ऐसा क्यूँ लगता है सीते?"

मेरे आने के बाद से, समय ने इस तरह करवट ली, जैसे लगता है सब मेरे आने के वजह से हुआ हो।
तुम बेवजह सोच रही हो, यह सब विधि के विधान से हो रहा है।
सीता ने राम के तरफ से अनुराग से देखा, एक सवाल आँखों में था कि आप कैसे कह सकते हैं, लेकिन राम के आँखों और होठों की मुस्कराहट ने उसके सवाल को भटका दिया था। सवाल कहीं ओझल थे लेकिन राम के जवाब वहीँ मौजूद होकर नतमस्तक थे।


राम ने कहा, " हमारा मिलना भी विधि के विधान से हुआ है सीते। मुझे स्वयम्वर में ऋषि विश्वामित्र लेकर आए थे लेकिन हम दोनों को मिलना था, वरना अनेक शूरवीरों की मौजूदगी में मुझसे वह शिव-धनुष टूटता नहीं।
राम के चेहरे पर तेज अब और प्रकाशमय होने चली थी। संध्या पहर में जहाँ हर चीज़ सुनहली होकर दमक रही थी वहीँ राम के चेहरे पर सुबह की लालिमा थी। इस जवाब से सीता के चेहरे पर भी एक विश्वास ने अपनी मोहर लगा दी थी।
लेकिन राम के मन में अभी भी यह ख्याल चल रहा था कि सीता ने ऐसा क्यों सोच लिया। क्या ज़िन्दगी में किसी के होने या न होने से क्या ज़िन्दगी रुक जाती है या गति में कोई फेर हो जाता है। उनके सवाल उन्हें चहल कदमी करने पर मजबूर कर रहे थे। दोनों भौंहें जुड़ने की जद्दोजहद में लगी थी।

लक्ष्मण को शायद यह दिखा की उसके बड़े भाई कुछ परेशान हैं। उसने सोचा चल के विचार किया जाए।
क्या हुआ भैया, आप कुछ चिंतित हैं? सवाल बेशक सीधा था लेकिन उसमें एक आग्रह था कि मुझे बताएँ की मैं क्या कर सकता हूँ आपके लिए। लक्ष्मण का समर्पण, राम के प्रति; किसी भक्त का भगवान के समान था।

कुछ नहीं लक्ष्मण, बस यूँही कुछ सवालों को बींधने की कोशिश चल रही थी।
तो मुझे भी मौक़ा दीजिये न भैया, बचपन में भी तो हमें पहले मौका मिलता था।
राम के चेहरे पर एक बड़प्पन ने दस्तक दी थी। उसने मुस्कुराते हुई कहा लक्ष्मण को बैठते हुए।
लक्ष्मण तुम्हे क्या लगता है किसी स्त्री के जीवन में शामिल होने से कितना फर्क पड़ता है? क्या नियति बदल जाती है?
भैया आप के यह सवाल कैसे हैं?
अभी तुमने आग्रह किया न की तुम्हे मौका दूँ, तो अब बताओ अपने अनुभव से। तुम वही कहो जो तुम्हे लगता है या क्या महसूस होता है।
भैया मैंने कभी गौर तो नहीं किया लेकिन हर मनुष्य का अपना अस्तित्व होता है और हर एक की ज़रूरत किसी के ज़िन्दगी में कभी न कभी आती है। मनुष्य अगर अकेला रह जाता तो भगवान् न जानवर न पेड़ पौधे बनाते। स्त्री के बिना, प्रकृति की कल्पना अकल्पनीय है। मेरे हिसाब से तो स्त्री एक सृष्टि होती है और पुरुष को उसकी रक्षा और हाँथ बटाने का माध्यम बना के भेजा जाता है।
नहीं, मैं यह जानना चाहता हूँ कि जो पूर्व निर्धारित है क्या किसी स्त्री के जीवन में प्रवेश करने से वह बदल सकता है?
भैया, अगर आप परीक्षा लेना चाहते हैं तो साफ़ कहें, ऐसे बातों में न उलझाएँ।
नहीं, मैं वाक़ई इसी बात का समाधान ढूँढ रहा हूँ।
भैया, सत्यवान की कहानी भूल गए क्या या किसी और की मौजूदगी को परख रहे हैं?
राम को न जवाब का अंदेशा था न लक्ष्मण द्वारा संशय को बींधने का। उनको आश्चर्य था देख कर की लक्ष्मण ने शायद उनके मन की बातों को भाँप लिया था लेकिन एक ही उदाहरण से उसने कितने सवालों का जवाब दे दिया था।
लेकिन लक्ष्मण क्या ऐसा हर युग में संभव होगा?
भैया, जब तक सृष्टि है और जब तक स्त्री अपने अस्तित्व को पहचानती रहेगी, हर लोक में यह संभव हो सकेगा।
लक्ष्मण के विश्वास पर राम को ताज्जुब भी था लेकिन भरोसा भी। लेकिन राम अभी भी और कुछ टटोलना चाहते थे।
इतने विश्वास से कह सकते हो?
आप माता सीता को देखिये, और उनसे पूछ के देखिये, सारे सवालों का जवाब आपको खुद मिल जायेगा। मैं तो इतना कहूँगा की यह पृथ्वी भी स्त्री है जो हम सबका पालन करती है। तो किसी के भी जीवन को एक स्त्री तो प्रभावित कर सकती है।
अच्छा, तो तुम्हे क्या लगता है, हमारे विवाह और सीता के आगमन से हमारा वनवास मात्र संयोग है या उसके आगमन से प्रभावित है या फिर विधि का विधान?
लक्ष्मण को शायद पता नही था गुरुकाल के बाद वनवास में भी उसके भैया उसे किसी शब्दों के चक्रव्यूह से भी अवगत कराएँगे।
भैया, हमारा वनवास माता सीता के वजह से नहीं बल्कि माता कैकेयी के वजह से हुआ जो कि एक स्त्री है लेकिन उन्होंने अपने हिसाब से सही किया होगा क्योंकि विधि के विधान से बुद्धि भ्रष्ट ज़रूर होती है। माता सीता का यहाँ होना हमारे लिए सौभाग्य की बात है। वह त्याग और समर्पण दोनों का एक साथ निर्वाह कर रही है।
राम को अपने जवाब मिल गए थे शायद। एक मुस्कराहट के साथ उन्होंने लक्ष्मण के कँधे को थपथपा दिया और अपने धनुष बाण के साथ निकल गए थे।

©Abhilekh

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Published Article / Bhopal Samachar