Story / बचपन वाला दिलवाले

बचपन आसमान में उस चिड़िया की जैसी होती है जिसकी पहचान तो नहीं कर पाते फिर भी उसे उड़ते देखते लगता है कि कभी हम भी ऐसे ही थे। और सबसे ज़्यादा हँसी तब आती है जब अपने बचपने में किसी से प्यार का इज़हार करना याद आ जाता है। सोमू को भी एक याद अक्सर ऐसे ही कुरेदती रहती थी।

"सोमू तुम सब से ज़्यादा यही गाना क्यों गाते हो?"

नाज़ के पूछने के अंदाज़ में जितनी जिज्ञासा नहीं थी उतनी शरारत थी क्योंकि वह उससे 2 साल बड़ी थी और पडोसी होने के नाते अपना हक़ समझती थी।

"कौन सा?"
'यही, "क्या करते थे साजना तुम हमसे दूर रह के"
"वो, अरे उसमे लाइन है न "हम तो दुआओं में खुदा से तुमको ही माँगा करते थे" बस जब गाते हैं तो लगता है कि हम ही सिर्फ ऐसा गा सकते हैं।"
"अरे लेकिन तुमको ऐसा क्यों लगता है? कोई पसँद कर लिए क्या?"
"अरे हम जब भी तुमसे मिलने आते हैं, हमको ऐसा ही गाना दिमाग में आने लगेता है। एक और भी अभी आ रहा है "जीना तेरी गली में"। और सोमू अपने रौ में आने वाला था।

"अरे तुम भी न, अच्छा, तो यह गाना और किसके लिए गाते हो?"
"हम तो बस तुम्हारे लिए ही गाते हैं कोई भी गाना।"

उसने बिना सोचे कहा था और शायद आगे भी कुछ कहना चाह रहा था लेकिन नाज़ उठने के लिए तैयार हो गयी थी।
1992 में सोमू क्लास आठवी में था और नाज़ दसवी में।

"कहाँ जा रही हो अब?"
"अब पढ़ना है हमको, अम्मी उठ गयी तो टाँग तोड़ देगी अभी अब्बू भी आ जाएँगे।"
"अरे अभी रुको न, मम्मी भी अभी तक नहीं आयी।"
"नहीं, हमको जाना है।"
"अच्छा, ठीक है...जाते हो जाने जाना, आखरी सलाम लेते जाना।"

सोमू के हर बात पर गाने से उसकी मम्मी भी परेशान रहती थी। लेकिन उसके डैड का भी यही अँदाज़ था कभी, तो कौन किससे शिकायत करे।
ख़ैर वक़्त बीत गए और हालात भी।
साल 1994। सोमू अब दसवी और नाज़ बारहवीं में। दोनों के बोर्ड के एग्जाम्स। अब सोमू कोई गाना नहीं गाता और नाज़ भी घर से नहीं निकलती। इंतज़ार वाले महीनो के बाद, उम्मीद वाले मार्च में किस्मत का परिणाम आया। सोमू फेल हो गया था और नाज़ का निकाह तय हो गया था।

उस साल दिलवाले फिल्म आयी थी, सब गाने हिट थे लेकिन एक ख़ास हो गया था, "जीता था जिसके लिए"।

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Published Article / Bhopal Samachar