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दरगाह से सशक्तिकरण तक।
http://uppatrika.com/read-news.php?newsid=3456
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले से जहाँ इस बात की मुहर लगा दी की सबको समान हक़ होगा हाजी अली दरगाह पर जाने का वहीँ अब ट्रिपल तलाक के मुद्दे को हवा देने की सरगर्मी शायद तेज़ हो जाए। अच्छी बात यह है कि साल खत्म होने से पहले इसपर फैसला आया है और ऐसे और भी संवेदनशील मुद्दे कोर्ट में लटके हुए हैं जिसपर राजनीति पुरे ज़ोर-शोर से हो सकती है। इन दोनों मुद्दे पर जहाँ राजनीती गर्माने का मौका ढूँढती रही है अब एक के निपटने से, उसके हिस्से का श्रेय लेने की भागमभाग शुरू हो जाएगी। एक तरफ जहाँ मुस्लिम महिलाओं के लिए एक खुशखबरी है वहीँ कुछ लोगों के लिए खतरे की भी आशंका है कि कहीं इस तरह हर बात पर कोर्ट न हस्ताक्षेप करने लगे। आने वाले दिनों में देखना यह दिलचस्प होगा की क्या इस जीत को सिर्फ नारी सशक्तिकरण से जोड़कर देखा जाएगा या वाक़ई इंसानियत की जीत मानी जाएगी। जहाँ संविधान सबको समान हक़ देने की बात करता है और धार्मिक उन्माद अक्सर उसमे रोड़ा बन जाती है , यह देखना दिलचस्प होगा की क्या आगे भी ऐसे फ़ैसले के लिए कोर्ट का ही दरवाज़े पर जाना होगा या लोग खुद ही समझदारी से फैसले लेंगे।
BCCI की फाँस।
http://uppatrika.com/read-news.php?newsid=3468
BCCI की सबसे बड़ी हथियार उसका पैसा होता है लेकिन लोढ़ा कमिटी ने नाकाबंदी ऐसी की है कि अब उसके हस्तक्षेप न झेलते बन रहा है न स्वीकारते। अब हाल फिलहाल में IPL की स्पॉन्सरशिप को लेकर जो टेंडर का खेल चल रहा था उसपर कमिटी ने पैनी नज़र रखते हुए अपने आदेश का इंतज़ार का चौकीदार खड़ा कर दिया है। एक तरफ जहाँ सोनी चैनल के पास प्रसारण स्वाधिकार की हिस्सेदारी ज़्यादा है और सुरक्षित भी, वहीँ इनके अलावा कुछ 18 बड़ी और अलग बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ भी शामिल है इसके टेंडर की होड़ में। इन कम्पनियों में रिलायन्स जियो, फेसबुक, ट्विटर, अमेज़न और स्टार चैनल जैसे दिग्गज भी अपने पाँव पसारने की तैयारी में जुटे हुए है। कहना अतिश्योक्ति नहीं की पैसे के इस खेल में कितना बड़ा खेल होगा।
BCCI पर उसे खुद का अंकुश एक फाँस सी बन गयी है और वो इसे न उतार सकती है न पहन के सहज हो पा रही है। ज़ाहिर सी बात है जिसे अपने मनमानी की आदत पड़ी हो और उसपर नाकाबंदी हो जाए तो नाक-भौंहे फुलेंगी ही। तमाम दलीलें दी है BCCI ने की IPL ने कैसे खेल और भारत की अर्थ व्यवस्था में कितना योगदान दिया है, कैसे खिलाड़ियों को अंतराष्ट्रीय स्तर पर लाया है। लेकिन कमिटी अपने ही ज़िद पर अड़ी है। देखना यह दिलचस्प होगा की कमिटी क्या फैसला लेती है क्योंकि BCCI ने प्रसारण, खेल और आयोजकों के नुक्सान की पैरवी तो की है लेकिन मन के चोर को तो गठरी की पड़ी है।
©Abhilekh
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सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले से जहाँ इस बात की मुहर लगा दी की सबको समान हक़ होगा हाजी अली दरगाह पर जाने का वहीँ अब ट्रिपल तलाक के मुद्दे को हवा देने की सरगर्मी शायद तेज़ हो जाए। अच्छी बात यह है कि साल खत्म होने से पहले इसपर फैसला आया है और ऐसे और भी संवेदनशील मुद्दे कोर्ट में लटके हुए हैं जिसपर राजनीति पुरे ज़ोर-शोर से हो सकती है। इन दोनों मुद्दे पर जहाँ राजनीती गर्माने का मौका ढूँढती रही है अब एक के निपटने से, उसके हिस्से का श्रेय लेने की भागमभाग शुरू हो जाएगी। एक तरफ जहाँ मुस्लिम महिलाओं के लिए एक खुशखबरी है वहीँ कुछ लोगों के लिए खतरे की भी आशंका है कि कहीं इस तरह हर बात पर कोर्ट न हस्ताक्षेप करने लगे। आने वाले दिनों में देखना यह दिलचस्प होगा की क्या इस जीत को सिर्फ नारी सशक्तिकरण से जोड़कर देखा जाएगा या वाक़ई इंसानियत की जीत मानी जाएगी। जहाँ संविधान सबको समान हक़ देने की बात करता है और धार्मिक उन्माद अक्सर उसमे रोड़ा बन जाती है , यह देखना दिलचस्प होगा की क्या आगे भी ऐसे फ़ैसले के लिए कोर्ट का ही दरवाज़े पर जाना होगा या लोग खुद ही समझदारी से फैसले लेंगे।
BCCI की फाँस।
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BCCI की सबसे बड़ी हथियार उसका पैसा होता है लेकिन लोढ़ा कमिटी ने नाकाबंदी ऐसी की है कि अब उसके हस्तक्षेप न झेलते बन रहा है न स्वीकारते। अब हाल फिलहाल में IPL की स्पॉन्सरशिप को लेकर जो टेंडर का खेल चल रहा था उसपर कमिटी ने पैनी नज़र रखते हुए अपने आदेश का इंतज़ार का चौकीदार खड़ा कर दिया है। एक तरफ जहाँ सोनी चैनल के पास प्रसारण स्वाधिकार की हिस्सेदारी ज़्यादा है और सुरक्षित भी, वहीँ इनके अलावा कुछ 18 बड़ी और अलग बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ भी शामिल है इसके टेंडर की होड़ में। इन कम्पनियों में रिलायन्स जियो, फेसबुक, ट्विटर, अमेज़न और स्टार चैनल जैसे दिग्गज भी अपने पाँव पसारने की तैयारी में जुटे हुए है। कहना अतिश्योक्ति नहीं की पैसे के इस खेल में कितना बड़ा खेल होगा।
BCCI पर उसे खुद का अंकुश एक फाँस सी बन गयी है और वो इसे न उतार सकती है न पहन के सहज हो पा रही है। ज़ाहिर सी बात है जिसे अपने मनमानी की आदत पड़ी हो और उसपर नाकाबंदी हो जाए तो नाक-भौंहे फुलेंगी ही। तमाम दलीलें दी है BCCI ने की IPL ने कैसे खेल और भारत की अर्थ व्यवस्था में कितना योगदान दिया है, कैसे खिलाड़ियों को अंतराष्ट्रीय स्तर पर लाया है। लेकिन कमिटी अपने ही ज़िद पर अड़ी है। देखना यह दिलचस्प होगा की कमिटी क्या फैसला लेती है क्योंकि BCCI ने प्रसारण, खेल और आयोजकों के नुक्सान की पैरवी तो की है लेकिन मन के चोर को तो गठरी की पड़ी है।
©Abhilekh
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