No Lust, Only Wander!
शुन्य की ओर ... हर वीक में एक दिन ऐसा ज़रूर आता है, जब मन करता है कि किसी ऐसी जगह के लिए निकल जाऊँ जहाँ सब हों और सब मुझसे अनजान हों। इसके लिए सड़क है, सोशल मीडिया है और कई सारे माध्यम हो सकते हैं जहाँ, होकर भी सबकुछ भुलाया जा सकता है। मेरे लिए ऐसी जगह सिर्फ पहाड़ है लेकिन लद्दाख के सूखे और मरे पहाड़ नहीं, हरे-भरे पहाड़ जहाँ सब कुछ सूखने के बाद भी नमी की परत बिछी होती है। मुझे आजकल इन्हीं जगहों पर हमेशा खोने का मन करता है। कोरोना के आने से पहले मेरे लिए ऐसी जगह सिर्फ एक ट्रेवलिंग डेस्टिनेशन जैसी थी जहाँ कुछ दिन समय बिताने के बाद वापस आना होता था, हालाँकि मुझे लौटना पसंद नहीं है लेकिन मैं कई बार कुछ सफर से लौट आया हूँ। पता नहीं तब सही किया था या नहीं, पता आज भी नहीं है लेकिन अब सिर्फ इतना लगता है कि लौट कर जो हासिल किया है क्या वो बिना लौटे हासिल किया जा सकता था? और अगर आज हासिल है तो वो कब तक रहेगा? इसलिए अब और ज़्यादा इच्छा होती है की सबको छोड़कर कहीं गुम हो जाऊँ। ज़िम्मेदारियों से भागना चाहता हूँ? पता नहीं... मुझे काफी साल हो गए हैं जॉब करते हुए इसलिए कभी-कभी लगता है कब तक च...