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कॉपीराइट का सेहरा कौन बाँधे।

यूँ तो अपने देश में कॉपीराइट एक्ट थोड़ी कमज़ोर है, फिर भी जिसके हाथ में लाठी होती है भैंस उसी के खूँटे में नज़र आती है। वाह-वाही किसे पसंद नहीं होती बस इसी चक्कर में थोड़ी चोरी-चकारी से या कहें तो प्रेरणा के नाम पर अपनी असली क़ाबलियत का परचम लहरा देते हैं। और यह खेल हमारे देश में भी बड़े अच्छे से खेला जाता है, वह अलग बात है कि संजीदा और खुफिया बातों पर भी इसी सन्दर्भ में ओछी राजनीती अपने धोती का रुमाल सर-ए-आम करती है।

कुछ दिन पहले जब भी कोई आतंकी दिवाली होती थी तो कोई सरगना या गुट इसकी ज़िम्मेदारी लेते थे। लेकिन अभी जब से, चुनावी दंगल का बिगुल बजा है और सीमा पर वानर सेना द्वारा लंका दहन हुआ है तब से हर चुनावी पैंतरा इसी के इर्द गिर्द अपना फन फैला रही है। अभी कुछ दिन पहले किसी जँगल से कुछ अनुयायियों ने भारी भरकम अक्षरों में छपवाया की "भाई इ नौटंकी के ज्ञानदाता हमाई है"। तब विद्रोही  शागिर्दों ने बताया कि पहले हमें बंदरों जितने फुर्तीले हो जाना चाहिए तब गाल बजाना चाहिए। तभी कहीं से कुछ दीमक के झुण्ड निकले और पूछने लगे की बंदरों ने किस पेड़ से उछल-कूद की थी, वह हमें दिखाओ क्योंकि हम तो पेड़ों को खोखला करते रहते है फिर उन्होंने ऐसे कैसे अंजाम दे दिया। सारा जंगल समझ गया इन लोगों से मुँह लगने का मतलब है न दही बचेगी न रायता बनेगा। इनकी नौटंकी अभी ख़त्म भी नहीं हुई थी की एक और मेमने ने अपनी दबी आवाज़ में ललकारा कि बानरों के सहारे क्रेडिट मत लो, हम भी ऐसे कई दलाली को अंजाम दे चुके हैं लेकिन खैर था उसकी अम्मा ने तुरंत उसे अंदर कर लिया नहीं तो मेमने और बाकि परिवार वाले, लगे हाथ त्योहारों में नाश्ता बन जाते।

खैर, इन तमाम मतभेद से यह साबित होता है कि अपने देश में मेहनत कोई और करे, खून को पानी बना कर कोई और बहाए लेकिन जब सेहरा बंधवाना होगा तो सबसे पहले ऐसे ही जानवर लार टपकाते अपना सर आगे कर के, आपका हिस्सा मार लेंगे। इसकी सबसे बड़ी वजह है इस जंगल में किसी का भी एकजुट न होना। तमाम गतिविधियों पर ध्यान दिया जाए तो सभी मूल मुद्दे से भटके एक दूसरे पर दोषारोपण में लगे हैं। यहाँ अफ़सोस यह है कि इन बिल्लियों की लड़ाई में भी कोई शातिर ऊदबिलाव ही हाथ मार पाएगा। आइए, तब तक अपने जंगल में इस सर्कस का मज़ा लेते है और देखते है किसके हाथ में भैंस जुगाली करती दिखेगी।

©Abhilekh

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