Story / दिवाली: कहीं रौशनी कहीं अँधेरा।
A Short Story
दिवाली : कहीं रौशनी, कहीं अँधेरा
"तनख्वाह आ गयी माँ ", रवीश ने घर में घुसते हुए माँ से कहा। माँ ने ईश्वर को धन्यवाद दिए कि इस बार सही समय पर पैसे घर आ गए क्यूंकि बस दो दिन ही रह गए थे दिवाली के लिए और कितने सारे घर के काम अभी भी रह गए थे, उस पर से नौकरानी भी नही आ रही थी 2 दिन से।
रवीश कि माँ ने नौकरानी के घर कहलवा दिया था कि घर की साफ़ सफ़ाई बाकी रह गए हैं इसलिए आ जाये नही तो 2 दिन के पैसे भी कटेंगे और दिवाली कि बख्शीश भी नहीं मिलेगी।
अगले सुबह 9 साल का मासूम सा लड़का चंदू, उनके दरवाज़े पर खड़ा था। रवीश की आज छुट्टी थी, बाहर आकर पूछा तो लड़के ने बोला माँ ने भेजा है घर का काम करने के लिए। सुनकर रवीश कि माँ बाहर आयी और काम करवाने से मना कर दिया।
लड़का मायूस होकर वापस लौट कर चला गया और अपनी माँ से सारी बात बता दी। रमा चिंतित हो गयी क्यूँकि उसकी तबियत इतनी खराब थी कि वो वह उठ कर पानी भी नहीं पी सकती थी। सारा दिन बिस्तर पर लेटे हुए गुज़रता था और इतने पैसे नही थे कि पास के किसी डॉक्टर से दिखवाए, दवाखाने से तो कई दिन से दवा लेकर भी कोई सुधार नहीं था।
चंदू सबके घरों में दिवाली कि तैयारी को देख रहा था और सोच रहा था कि हमलोग कब शुरू करेंगे अपने घर की साफ़-सफाई और कब घर को सजाना शुरू करेंगे, क्यूंकि बस अब अगले ही दिन दिवाली थी। उससे रहा न गया और माँ से बोला मैं खुद घर धो देता हूँ।
माँ के आँखों में आँसू आ गए और सूखे होठों पे मुस्कान भी दौड़ गयी।
आज दिवाली थी। सब तरफ़ हर्षोल्लास और पटाख़ों कि धूम थी। रवीश का घर रोशनी से चम-चमा रहा था। चंदू बहुत सोचा कि वह अपने घर में कैसे रौशनी करे, इसी सोच में वो रवीश के घर तक पहुँच गया। उसने देखा कुछ मोमबत्तियाँ आधी जल कर बुझी हुई थी। उसने जैसे ही उसे उठाने के लिए हाथ बढ़ाया रवीश ने अंदर से देख लिए और डाँटा। चंदू ने कहा उसे बस 2 ही चाहिए। उसकी मासूमियत देख कर रवीश ने वो मबतियाँ उसे दे दी। पुरे जोश के साथ चंदू दौड़ा अपने घर कि तरफ। तुरंत घर से माचिस लेकर मोमबत्तियाँ जलाने लगा और माँ को पुकारा। माँ कि कोई आवाज़ न आने पर वो गया माँ को उठाने के लिए। खूब प्यार से उसके सिरहाने आकर कहा "माँ, देख घर में रौशनी हो गयी ", लेकिन उसे कोई जवाब नही मिला। माँ को हिलाया, बहुत बार बोला उठने के लिए, लेकिन कुछ हासिल न हुआ।
वह रोता हुआ मोमबत्ती के पास खड़ा हो गया और भीगी आँखों से अगल-बगल के घरों कि रोशनियों को देख रहा था।
©Abhilekh
दिवाली : कहीं रौशनी, कहीं अँधेरा
"तनख्वाह आ गयी माँ ", रवीश ने घर में घुसते हुए माँ से कहा। माँ ने ईश्वर को धन्यवाद दिए कि इस बार सही समय पर पैसे घर आ गए क्यूंकि बस दो दिन ही रह गए थे दिवाली के लिए और कितने सारे घर के काम अभी भी रह गए थे, उस पर से नौकरानी भी नही आ रही थी 2 दिन से।
रवीश कि माँ ने नौकरानी के घर कहलवा दिया था कि घर की साफ़ सफ़ाई बाकी रह गए हैं इसलिए आ जाये नही तो 2 दिन के पैसे भी कटेंगे और दिवाली कि बख्शीश भी नहीं मिलेगी।
अगले सुबह 9 साल का मासूम सा लड़का चंदू, उनके दरवाज़े पर खड़ा था। रवीश की आज छुट्टी थी, बाहर आकर पूछा तो लड़के ने बोला माँ ने भेजा है घर का काम करने के लिए। सुनकर रवीश कि माँ बाहर आयी और काम करवाने से मना कर दिया।
लड़का मायूस होकर वापस लौट कर चला गया और अपनी माँ से सारी बात बता दी। रमा चिंतित हो गयी क्यूँकि उसकी तबियत इतनी खराब थी कि वो वह उठ कर पानी भी नहीं पी सकती थी। सारा दिन बिस्तर पर लेटे हुए गुज़रता था और इतने पैसे नही थे कि पास के किसी डॉक्टर से दिखवाए, दवाखाने से तो कई दिन से दवा लेकर भी कोई सुधार नहीं था।
चंदू सबके घरों में दिवाली कि तैयारी को देख रहा था और सोच रहा था कि हमलोग कब शुरू करेंगे अपने घर की साफ़-सफाई और कब घर को सजाना शुरू करेंगे, क्यूंकि बस अब अगले ही दिन दिवाली थी। उससे रहा न गया और माँ से बोला मैं खुद घर धो देता हूँ।
माँ के आँखों में आँसू आ गए और सूखे होठों पे मुस्कान भी दौड़ गयी।
आज दिवाली थी। सब तरफ़ हर्षोल्लास और पटाख़ों कि धूम थी। रवीश का घर रोशनी से चम-चमा रहा था। चंदू बहुत सोचा कि वह अपने घर में कैसे रौशनी करे, इसी सोच में वो रवीश के घर तक पहुँच गया। उसने देखा कुछ मोमबत्तियाँ आधी जल कर बुझी हुई थी। उसने जैसे ही उसे उठाने के लिए हाथ बढ़ाया रवीश ने अंदर से देख लिए और डाँटा। चंदू ने कहा उसे बस 2 ही चाहिए। उसकी मासूमियत देख कर रवीश ने वो मबतियाँ उसे दे दी। पुरे जोश के साथ चंदू दौड़ा अपने घर कि तरफ। तुरंत घर से माचिस लेकर मोमबत्तियाँ जलाने लगा और माँ को पुकारा। माँ कि कोई आवाज़ न आने पर वो गया माँ को उठाने के लिए। खूब प्यार से उसके सिरहाने आकर कहा "माँ, देख घर में रौशनी हो गयी ", लेकिन उसे कोई जवाब नही मिला। माँ को हिलाया, बहुत बार बोला उठने के लिए, लेकिन कुछ हासिल न हुआ।
वह रोता हुआ मोमबत्ती के पास खड़ा हो गया और भीगी आँखों से अगल-बगल के घरों कि रोशनियों को देख रहा था।
©Abhilekh
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