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एक अरसे की खामोशी...

एक अरसे की खामोशी...। खामोशियाँ बिखरी थी कमरे में और उम्मीदें रौशनी बन कर चहक रही थी। एक अजब सा माहौल था कमरे में जहाँ सब होकर भी नहीं थे। सन्नाटा सा था लेकिन कहीं किसी कोने से क...

काश और कश

काश और कश काश के मारे, अक्सर कश के सहारे मिलेंगे। कुछ घुटन अंदर और कुछ बाहर रखने की जद्दोजहद में अपने ऊंघते झुंझुलाहट को धुएँ की शक्ल में देखते हैं। 2 ऊँगली जैसे ज़िन्दगी और मौ...

बूँद

बूँद। गीले पत्तों पर थिरक कर जो बूँद गिरी थी अभी अभी, ज़मीं पर कहीं खो गयी थी। देखा तो पत्तों ने भी, बारिश और और उस मिटटी ने भी, लेकिन किसी ने कुछ बताया नहीं। हर ओर बरसात का शोर और उ...

कहना और जताना।

कहना और जताना। कहने और जताने के बीच में अक्सर एक फासला रह जाता है। फासला.. एक ठहराव कह सकते है जो परस्पर बना रहता है और जो उससे गुज़रते हैं उनको वह क्षण भर का लगता है। कहना सरल तो ...

Khamoshiyon ki baaten...!

खामोशियाँ बेबाक होती है और उदंड भी। संवाद, मन-मर्ज़ियों का फ़रेब ले कर अक्सर एक मोड़ ले लेती है और उड़ेल देती है खामोशी..। शुन्य सी होती है वह ख़ामोशी लेकिन साथ देने की हिम्मत कोई सं...

अंतर्मन की बातें... और अधूरापन।

मन की सूखी मिट्टी से सिर्फ ढेर बनती है, लेकिन हलकी सी नमी मिल जाए तो आकार लेना स्वाभाविक होता है...और फिर वह नमी अक्सर ज़िन्दगी को एक मोड़ पर नयी पहचान देती है। लेकिन यह भी ज़रूरी है...

हमसाया

हमसाया।। सीढ़ियों पर आहट तो थी लेकिन कोई अक्स न था। और जिस रफ़्तार में थी उसमे थकन भी नहीं था.. जैसे  कोई वेग से किसी को बींधना चाहती थी। परछायी भी थी लेकिन कोई जिस्म नहीं था.. जैसे...