कहना और जताना।
कहना और जताना।
कहने और जताने के बीच में अक्सर एक फासला रह जाता है। फासला.. एक ठहराव कह सकते है जो परस्पर बना रहता है और जो उससे गुज़रते हैं उनको वह क्षण भर का लगता है।
कहना सरल तो होता है लेकिन शब्दों का जाल समझ के अनुसार बुनता है और फिर फैलता है। जो फँसते है फिर उनका अपना दृष्टिकोण होता है। कहने से सब जताया जा नहीं सकता क्योंकि समझ की एक सीमा होती है जो हम खुद तय कर लेते हैं। और फिर पुरे तरीके से जताने का जतन बाकि रह जाता है। जाताना भी और कहना भी.. दोनों अधूरे और एक दूसरे के पूरक भी .. एक दूसरे को दोष देते रहते हैं।
इन दोनों कोशिशों में जो बाज़ी मारते हैं वो होती अंतर्मन का द्वन्द। सबके बीच में, मौन रहकर एक कोलाहल चलता रहता है। कभी कोई घुटन घूरती है तो कभी कोई परछायी घेरती है। कहना और जताना दोनों अपनों के बीच में अंजानो सा सहयोगी ढूँढ़ते रहते है। एक पहल साथ का नहीं करते.. साथ... भले जब तक संभव हो तब तक तो चल सकते हैं। बाकि साथ तो कुछ भी नहीं रहता..।
©Abhilekh
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