अंतर्मन की बातें... और अधूरापन।

मन की सूखी मिट्टी से सिर्फ ढेर बनती है, लेकिन हलकी सी नमी मिल जाए तो आकार लेना स्वाभाविक होता है...और फिर वह नमी अक्सर ज़िन्दगी को एक मोड़ पर नयी पहचान देती है। लेकिन यह भी ज़रूरी है की नमी की मात्रा सही हो वरना फिर न मिट्टी किसी काम की होती है न नमी, हाँ बस एक पड़ाव आ जाता है उसके सूखने तक के लिए.. जीवन में जैसे अक्सर आता है एक ठहराव। फिर भी अंतर्मन का गीलापन कभी नहीं सूखता, वह तो परस्पर नमी ही टटोलता है।

जेठ की गर्मी से भी ज़्यादा उष्मित होती है किसी की संवेदनाएँ क्योंकि वो भीग के पनपते है जैसे आषाढ़ के दिन हों। कुछ देर की हर फुहार एक टीस दे जाती है और अंतर्मन में रह जाती है वह उमस जिसे सब सौंधी सुगंध समझते हैं। सब बीतता है अपने हिसाब से, बस समय का हिसाब नहीं बीतता.. वह हर पल जताता है बीता कल और आने वाला पल। और तमाम मौसम खालीपन को बिखेरे जाते हैं।

मन वह चाँद है जो पूरा एक बार ही होता लेकिन उस पुरेपन के लिए हर अधूरेपन से उसे गुज़रना होता है क्यूँकि वह अधूरापन एक कारवाँ है। अधूरापन न मिले तो कमी की खबर नहीं होती इसलिए किसी एक की कमी ज़रूरी है ज़िन्दगी में.. अपने एक पुरेपन के लिए।

#Abhilekh

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