काश और कश
काश और कश
काश के मारे, अक्सर कश के सहारे मिलेंगे। कुछ घुटन अंदर और कुछ बाहर रखने की जद्दोजहद में अपने ऊंघते झुंझुलाहट को धुएँ की शक्ल में देखते हैं। 2 ऊँगली जैसे ज़िन्दगी और मौत में फँसी होती है पूरी ख्वाहिशें, और सुलगते, थके राख में तब्दील होकर बिछड़ती रहती है अपने अस्तित्व से। बहुत मुश्किल है अपनी ख्वाहिशों को शक्ल देना या उसे बयाँ करना, क्योंकि कोई उसे वाज़िब नहीं समझता। इसलिए, काश बस कश के सहारे बयाँ होता रहता है।
यह अलग बात है उसके धुएँ से दूसरों को तक़लीफ़ होती है क्योंकि वह तो झुंझुलाहट होती है, वह भी किसी और की.. तो फिर कोई गैर क्यों और कैसे बर्दाश्त करे। साथ मिलते है तभी तो एक काश ही कितने ज़हन से हो कर सफर पूरा कर लेता है, हाँ औरों की नज़र में वह चेन-स्मोकर की भीड़ होती है। शायद इसलिए इनके लिए स्मोकिंग ज़ोन बना देते है ताकि भिड़ते फिरे, टकराते रहे और सारी झुंझुलाहट को एक बादल बना कर भुला दें। बहुत कमज़ोर होते है क्या ये काश?
वैसे यह काश न हो तो दिमाग भी सातवें आसमां पर हो जाएगा, क्योंकि फिर अफ़सोस कहीं गुमशुदा रहेगी.. और मतलबी दुनिया में तो वैसे भी खोए की कोई पहचान नहीं करना चाहता। ज़रूरी है काश का होना और उसका किसी तरह तिल-तिल रिसना वर्ना उम्मीदों का कारवाँ का क्या होगा। बस, यह काश के मारे कश से निकल कर कोशिश की कशिश में डूब जाएँ तो शायद हर धुएँ की शक्ल में कोई मेहबूब मिलने लगे।
©Abhilekh
Comments
Post a Comment