एक अरसे की खामोशी...
एक अरसे की खामोशी...।
खामोशियाँ बिखरी थी कमरे में और उम्मीदें रौशनी बन कर चहक रही थी। एक अजब सा माहौल था कमरे में जहाँ सब होकर भी नहीं थे। सन्नाटा सा था लेकिन कहीं किसी कोने से कुछ आवाज़ें भी आ रही थी।
शायद दीवारें आपस में कह रही थी:
"तमाम उम्र जो गुज़री है बंद दरवाज़ों में, कोई छत गिरा दे तो साँस ले लूँ"
"अब तो ज़लज़ला ही आ जाए, की मुद्दत हुयी कोई शोर सुने"
यह शायद दीवारों का रोना था जो साथ थे लेकिन तन्हा थे या किसी की गैर मौजूदगी ने इनकी मौजूदगी को फीका कर दिया था।
रौशनी बड़बड़ायी:
"फ़क़त इंतज़ार ने बोझिल किया है, और वक़्त है ना-मुराद जो गुज़रता ही नहीं"
शायद उसे इल्म नहीं की वक़्त कितना गुज़र गया या बंद चारदीवारी ने उसे उसके इंतज़ार का एहसास नहीं करवाया।
परदे में आहट हुयी:
"अब एहसास नहीं फिरते आवारा, वह तो बस बिस्तर की सिलवटों से लिपटे रहते हैं"
"अब रूह में वो पारदर्शिता नहीं कि एहसास कहीं और भटक जाए" शीशे ने परदे से कहा था।
हाँ, तभी तो बिस्तर की सिलवटें भी अपनी शक्ल बदलती है हर सुबह"।
सुबह को शायद अच्छा नहीं लगा सुनकर।
"वक़्त होता है बीत जाने के लिए, कि तोहमतों का दौर आए भी और बीत जाए भी", सुबह का अपना अंदाज़ था।
"हमने भी छुप कर देखा है रूह से जिस्म निकलते हुए"
"लम्हों में ही बीत जाते है कुछ वफाएँ और कुछ फ़रेब"
शीशे और परदे की गुफ़्तगू पर सबने कान दे रखा था।
फ़र्श से जब रहा न गया तब उसने दबी आवाज़ में कहा:
"रहने दो वही खामोशियाँ, कि बातें अब सुकून नहीं देती...
चँद लफ़्ज़ों की कारीगरी, जज़्बातों में जूनून नहीं देती..।
इतना कहना था और सन्नाटा पहले से ज़्यादा मुस्कुरा रहा था...।
©Abhilekh
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