हमसाया
हमसाया।।
सीढ़ियों पर आहट तो थी लेकिन कोई अक्स न था। और जिस रफ़्तार में थी उसमे थकन भी नहीं था.. जैसे कोई वेग से किसी को बींधना चाहती थी। परछायी भी थी लेकिन कोई जिस्म नहीं था.. जैसे कोई रूह हो जो अपनी मौजूदगी जता रही थी। कोई गँध नहीं, कोई छुअन भी नहीं थी लेकिन कुछ था जो इर्द गिर्द मौजूद था... या ज़हन की कोई उपज थी। बहुत देर तक यह सिलसिला चला, फिर अचानक सब शाँत हो गया लेकिन मन के सवाल.. या भय वो अब भी अशाँत थे। किसी अजनबी से ने कितना झकझोर दिया था पुरे ख्याल को... जैसे कोई बदला लेना था।
अब शुरुआत का माहौल अंदर के तरफ था.. दिल से लेकर दिमाग तक.. और रोम रोम पूछ रहा था। सवाल सब पूछते हैं, क्यूँकि जवाबों के लिए घेरना किसी चक्रव्यूह को रचने से ज़्यादा आसान होता है। जवाब फिर भी देना होता क्योंकि मौन तो लावारिस होती है, हर कोई उसको अपनी समझ से दुत्कारता है।
जवाब तो बस इतना था की जो गुज़रा... वो अपना ही साया था जो कहीं बिछड़ा था। अब मिल गया है.. इसलिए थोड़ी हलचल है। बहुत दिनों के बाद जब खुद से मिलो तो रूह ऐसे ही बदहवास होती है.. खैर, अब बिखरेंगे फुरसत से लेकिन सब एक साथ।
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