Published Article / वंशवाद का प्रजातंत्र
वंशवाद का प्रजातंत्र भारत में जबसे प्रजातंत्र प्रणाली स्थापित हुई तबसे विश्व में एक मिसाल कायम हुई की प्रजातंत्र व्यवस्था से ही देश को भली-भाँती और शान्तिपूर्वक चलाया जा सकता है। अन्य देशों की तरह भारत में न ही धर्म प्रधान है न ही शासकीय व्यवस्था की व्यवस्था संभव है। जनता अपना प्रतिनिधि खुद चुनती है और उन्हें नेता का दर्ज़ा देकर उन्हें देश का नेतृत्व करने का अवसर प्रदान करती है ताकि आने वाले समय के लिए देश उन्नति की ओर अग्रसर रहे। नेतागण का फिर यह फ़र्ज़ होता है कि वह जनता के कसौटी पर खरा उतरे और देश के साथ देशवासियों के उज्जवल भविष्य के लिए पथ-प्रदर्शक के रूप में सामने आये। देश के पहले प्रधानमंत्री बनने का गौरव प्राप्त हुआ श्री जवाहरलाल नेहरु जी को और फिर उनके उपरान्त श्री लाल बहादुर शास्त्री को। लेकिन वक़्त के बदलते ही इस प्रजातंत्र प्रणाली का अस्तित्व धूमिल होने लगा। नेता खुद ही फैसला करने लगे की अगला उम्मीदवार कौन होगा और फिर शुरू हो गयी हर क्षेत्र में अपने वर्चस्व को बढ़ावा देने की होड़। 80 के दशक के बाद तो भाई-भतीजावाद इस क़दर हावी हुई की लगने लगा जनता अब सिर्फ मूक दर्शक का किर...