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 सौंदर्य और बदलते वक़्त में उसका परिदृश्य

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सौंदर्य इन्सान का वो अभिन्न हिस्सा है जिसके बगैर वो हमेशा अपने को अधुरा समझता है। यह एक चरित्र का हिस्सा है जिसका उल्लेख हर विषय और काल में मिलता आया है। वहीँ सौंदर्य कभी विषय-वस्तु के तौर पर भी इस्तेमाल किया जाता है। आज से नही बल्कि आदिकाल से यह खेल के रूप में भी प्रस्तुत हुई है। वेद-पुराणों में भी इसका उल्लेख मिलता है की किस तरह देवताओं ने तपस्या करने वालों का ध्यान भंग करने के लिए अप्सराओ का सहारा लिया था। उन्होंने तो सुंदर स्त्री का रूप धर कर दत्यों का भी नाश किया था, लेकिन वह उन्होंने जन कल्याण और सत्यता की जीत के लिया किया था।

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लेकिन अब तो कलयुग है और आज के काल में सौंदर्य की महत्ता कुछ और हो गयी है। अब सौंदर्य आदिकाल के ठीक विपरीत परिस्थितयों में बसर कर रहा है, क्यूँकी अब सौंदर्य सिर्फ विषय-वस्तु है जिसकी लोलुपता में संसार विषमता की गर्त में गिरता जा रहा है। आज हर वस्तु में उपभोक्तावाद की उपज की जाती है और इसके लिए उसमें जबरन स्त्री-सौंदर्य की लीपापोती की जाती है। और इस लीपापोती का दुष्परिणाम सिर्फ महिलाओं को झेलना पड़ता है, और इसके जिम्मेवार हम खुद है। दुनिया भर के विज्ञापन और साधन बताए जाते सौंदर्य निखार के लिए और वास्तव की ज़िन्दगी से सही सौंदर्य बोध की परिभाषा ही धूमिल होती जा रही है। अब सौंदर्य सिर्फ गोरापन तक सिमट गयी है। शादी में भी प्राथमिकता गोरे लड़के और लडकियाँ होती है। यही नही बच्चे भी सिर्फ उनसे ही मेलजोल बढ़ाते है जो दिखने में सुंदर हो यानि जो गोरे है और वह सब सीखते है अपने आस पास माहौल से। शादी शुदा जोड़े भी गोर संतान की ही उम्मीद करते है। किताबों में अक्सर पढने के लिए मिलता है कि आन्तरिक सौंदर्य बोध को प्राथमिकता मिलनी चाहिए, लेकिन अपना समाज ठीक इसके विपरीत चलता है। ऐसी परिस्थितियाँ सामने लायी जाती है कि हर कोई येही सोचता है कि इस समाज में सिर्फ गौरवर्ण वालों की ही गुज़ारा संभव है। यह एक ऐसी विचारधारा बन गयी है आज के समाज में जिससे हर किसी का जीना मुश्किल होता जा रहा है। ऐसी सोच ने ही अनगिनत कुरीतियों को जन्म दिया है। ऐसी मानसिकता ही समाज को कलंकित कर रही है। अगर नारी जाती दहेज़ उत्पीड़न और कन्या भ्रूण हत्या की शिकार हो रही है तो एक वजह यह रंग भेद की निति भी है। सांवली बहु नही चाहिए किसी को क्यूंकि उनका वंश ख़राब हो जायेगा, ऐसी सोच से भला कोई परिवार भी चलेगा यह कहना भी उचित नही। बचपन में ही हिदायत मिलने लगती है धुप में बाहर मत जाओ काले हो जाओगे, ज्यादा चाय मत पीओ रंग काला होजायेगा, हद्द है ऐसी बेबुनियादी और बेमतलब के बेतुके हिदायतों की। इसी वजह से ही बचपन में ही यह सोच घर कर जाती है की दुनिया में बस गौरवर्ण ही पूजनीय है। एक बात बड़ी हास्यास्पद भी है हमारे दोमुंहे समाज में की अगर किसी को सफ़ेद दाग का रोग हो जाये तो लोग उससे पल्ला झाड़ने लगते है, तब कोई उसे यह कहकर गले नही लगाता की अब तो तुम गोरे हो रहे हो। बाल सफ़ेद होते ही चिंता हो हो जाती तब यह नही कहते की मेरे बाल गोरे हो रहे है। खूबी की बात यह मानसिकता सिर्फ स्वार्थ सिद्धि के लिए अपनायी गयी है क्यूंकि अभी तक कोई ख़ास वजह नही है किसी के पास यह बताने के लिए सांवला या काले रँग से क्यूँ परहेज किया जाये। अगर अध्यात्म की दृष्टी से भी हम गौर करेंगे तो यह बखूबी जानते है कि देवताओं में भी जिन्हें पालनहार कहा जाता है वह भी साँवले ही है और उन्होंने जो राम और कृष्ण का अवतार लिया वह भी सांवले ही थे, फिर भी इंसान गोरापन का ढोंग किए जा रहे है। जबसे पृथ्वी और इन्सान का सृजन हुआ तब ऐसा कुछ नही था लेकिन जैसे जैसे समाज उन्नति की ओर अग्रसर होने लगा अपनी तुच्छ इच्छाओं की पूर्ति के लिए मनमाने और उलजलूल हथकंडे अपनाने लगा, यह रंग भेद भी उसी की उपज है। गोरे होने का भी खामियाजा भुगतना पड़ता है तब खुद ही अपने सुंदर होने को कोसते है लेकिन यह नही समझना चाहते कि अगर रंग के चक्कर में न पड़ कर हर इन्सान एक दुसरे को समझे और इज्ज़त करे तो किसी प्रकार की समस्या नही खड़ी होगी।

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हम अक्सर ध्यान नही देते लेकिन ज़रा गौर से सोचिय, उनकी मनः स्थिति क्या होती होगी जिनको अपने सांवलेपन की वजह से दुत्कार और निराशा का मुँह देखना पड़ता है। भले बहस के लिए यह कह सकते हैं की कितने मशहुर शख़्सियत हुए है जिन्होंने सांवले होते हुए भी समाज में अपना मुकाम बनाया, लेकिन आम इंसान आज भी इससे जूझता है। जितना हम रंग-भेद की नीति के लिए विदेशों को दोष देते रहते है उतना ही हम अपने देश में प्रचलित इस कुप्रथा को नज़रंदाज़ करते है। कोई यह नही सोचता की किसी भी इंसान के लिए संभव नही की वो अपने मुताबिक अपने जिस्म का रंग तय करे, फिर यह भेदभाव क्यूँ किया जाता है। क्यूँ किसी इंसान का उस कारण के लिए तिरस्कार किया जाता है जो उसके वश में नही है...? ऐसे भेदभाव से हम समाज को भी बाँट देते है और इश्वर द्वारा बनाये सौंदर्य का अपमान भी करते है। हमें यह मानना चाहिए कि हर रंग में एक खूबसूरती होती है और हर कोई प्यार के क़ाबिल होता है। सिर्फ किसी के जिस्मानी रंग से हमें उसकी शख़्सियत नही आकनी चाहिए। किसी के प्राकृतिक रंग के लिए हमें समाज में भेदभाव नही फैलाना चाहिए वरना अपना यह बाँटा हुआ समाज जाने और कितने हिस्सों में बँट जाएगा।

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