Emotions का loose motion..
Emotions ऐसी dysentery है जो शुरु हो जाये तो आसानी से नही रूकती। अभी कुछ दिन से चुनाव की चिलम चढ़ा के सब मज़े ले रहे थे कि इतने में Mother's Day ने emotion में twist दे दिया। एक ही दिन में लगने लगा आज कहीं सब के सब बौराए हुए है क्या। Calendar देखा तो तसल्ली हुई की चलो एक ही दिन की नौटंकी है नही तो क्या Fb और क्या whatsapp...लगा जैसे हम तो जीते जागते किसी और ही दुनिया में है जहाँ मार emotion की loose motion बड़ी uncontrolled स्तिथि में है। कमाल की बात थी किसी ने अपने सास के लिए नही जताया था। क्यूँकी माँ और सास में अंतर होता है....चन्द्रबिन्दु का..सास पर लगाओ तभी तो उसकी कद्र होगी। लेकिन फिर वही emtion का motion loose करने वाली बात हो जाएगी।
ऐसे में कुछ देशभक्त और संस्कृति के मरीज जागे अपना अलाप लिए की यह भारतीय संस्कृति नही है। मन तो किया की दें कुछ कंटाप और पूछे साले फिर FB/Whatsapp पर तुम क्या कर रहे हो। TV/bulb यह सब क्या तुम्हारे दादा ने बिजली के साथ रात बिताने के बाद उपजाई थी। दोगलेपन का emotion ऐसा मत चलाओ की औरों का motion loose हो जाये। जब ज़रूरत होगी देशभक्ति की तो भाई-भतीजावाद/क्षेत्रवाद/जातिवाद का emotional drama शुरू कर देंगे और कुछ अच्छा हो रहा है तुम अपने बवासीर का इलाज़ करवाओ।
लेकिन क्या है न अपुन इन्सान लोग सब बहुते भावुक है। मौका मिला नही की emotion की दही का रायता/मट्ठा/लस्सी सब तैयार कर लेते है और सामने वाले के पसंद के हिसाब से थोप देते है। खैर, अब यह तो बीत गया आज से नया emotion शुरू होगा। फ़िलहाल तो वही चुनावी पैखाने के बाहर सब कतार में खड़े है क्यूँकी सबका हाजमा बिगड़ा हुआ है और महीने के अंत में ही सब साफ़ होगा..पेट भी और पैखाना भी। अरे क्यूँकी उसके बाद हगने वाले काम पर लग जाएँगे और जमादारों की ज़रूरत भी बढ़ जाएगी।
फिलहाल emotion पर control रखिये। पढ़िए और flush करिए। कम पर लगिए।
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