Published Article in उड़ान ... एक अनुभूति। A quarterly magazine
पर्वत की विडंबनाएँ
यूँ तो भारत अपने विभिन्न कारणों से पर्यटन का केंद्र है लेकिन एक ऐसा भी हिस्सा है जो देसी/विदेशी सभी पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है, और वह है यहाँ के पहाड़ और उनका मनोरम वातावरण, प्राकृतिक सम्पदा और पहाड़ियों की मासूमियत में लिपटी सादगी सी भरी खुशमिजाज़ ज़िन्दगी। आप चाहे उत्तर या उत्तर-पूर्वी पहाड़ियों पर आच्छादित बर्फ़ का आनंद उठाना चाहते हो या दक्षिण भारत या पश्चिमी भारत के बादलों से घिरे पहाड़ों का आनंद उठाना चाहे, सबका एक अलग आनंद होता है। और फिर दुधिया रँग से प्रतीत झरने जो आपको भी मचलने के लिए विवश कर देते है। चहल कदमी करते मिल ही जाती है फूलों की क्यारियाँ फिर क्या कश्मीर, शिमला या ऊटी। झुके बादलों को देख कर लगता है अभी पकड़ कर रख लूँ या फिर इनमे ही कहीं छुप जाऊँ। ठंडी हवा के साथ ओस के बूंदों की छुअन जीने की ललक बढ़ा जाती है। सँकरे रास्तों से गुज़रते हुए मूल निवासियों की मुस्कान देख कर लगता कि कैसे खुशहाल सी ज़िन्दगी को हमने उलझा रखा है।
किसी भी पर्यटक के नज़रिए से पहाड़ पर बसने की ख्वाहिश शायद आखरी होती होगी, लेकिन यह रूमानी ऐनक उतार कर शायद ही कोई पहाड़ियों के संघर्षमयी जीवन के बारे में सोचता होगा। जहाँ एक तरफ पहाड़ों पर उद्योग धँधे को स्थापित करना चुनौती है वहीँ आज ज़रूरत भी है। लेकिन अफ़सोस की बात है कि अब पहाड़ी पर्यावरण का हनन होने लगा है। कृषि, जो पहाड़ों की मूल उद्योग साबित हो सकती है अब उसे ही नज़रंदाज़ किया जा रहा है। भोले पहाड़ियों को पैसे की लालच दिखा कर पहाड़ों से पलायन का रास्ता दिखाया जा रहा है। इसी करणवश प्रशासन भी बेपरवाही का रुख अपनाये हुए है और पहाड़ी जन-जीवन चरमरा रही है। उत्कृष्ट प्राकृतिक सम्पदा होने के बावजूद पहाड़ों में आर्थिक तंगी का माहौल है। यह जानते हुए भी कि सिर्फ पर्यटन से कुछ ज़्यादा लाभ नहीं होगा, प्रशासन इसके लिए कोई ठोस कदम नहीं उठा रही है। भूस्खलन और बाढ़ की विपदा बाद बस मुआवजे की घोषणा कर अपना पल्ला झाड़ लेते है लेकिन भविष्य के लिए कोई उपाय नहीं बनाये जाते।
बात सिर्फ यहाँ पहाड़ी सम्पदा के सरंक्षण की नहीं है बल्कि सभ्यता, संस्कृति की भी है जो नशा आदि जैसे व्यसनो से धूमिल होती जा रही है। हमें यह याद रखना होगा की संस्कृति उस मछली की तरह है जो पानी से अलग होते निष्प्राण हो जाती है, कहने का तात्पर्य यह है कि संस्कृति लोक-श्रम पर आधारित होती है और लोक-जीवन से हटते ही संस्कृति भी निष्प्राण हो जाती है। यहाँ मैं यह भी स्पष्ट कर देता हूँ कि हमें पर्वतीय संस्कृति के सरंक्षण की आड़ में विकास को नज़रंदाज़ नहीं करना है। हमें एक सामंजस्य स्थापित करना है जिससे आगे की पीढ़ी को मजबूत नींव भी मिले और दिशा भी। अगर पहाड़ी कृषि, कला और अन्य मूल सम्पदाओं पर एकजुट होकर काम करेंगे तो सब सम्भव होगा। क्यूँकी बदलते वक़्त के साथ अब भूगोल भी बदल चुका है। अब पहाड़ और मैदान के बीच को यातायात की साधनों ने पाट दिया है जिसके फलस्वरूप "पहाड़ी", "पहाड़ीपन", "पहाड़ी संस्कृति" की परिभाषाएँ तेजी से बदल रही है। और यह बदलाव हमारे जीवन का एक ऐसा तथ्य है जिसे इनकार करना कायरता होगी। और इस बदलाव को पर्वतीय समाज के हित में लाना ही निश्चित रूप से अक़ल्मंदी और साहस का परिचायक साबित होगी। पुरानी संक्रीड़ता के चौखट पर भविष्य का गला घोंटना लाज़मी नहीं।
एक और बात पर रौशनी देने की ज़रूरत है और वह है पर्वतीय समुदाय। हमें जाती धर्म से ऊपर उठना होगा। पर्वतीय समुदाय जैसे सिर्फ़ बौध भिक्षुओं तक नहीं है उसी तरह किसी को अल्प-संख्यक की श्रेणी में लाना भी अनुचित है। इन्ही वजहों से हम एक होकर भी अलगाव वाली एकता में जी रहे है। हमें यह देखना चाहिए कि कोई भी अनपढ़ या कम विकसित किन्तु शारीरिक श्रम करने वाला एक पहाड़ी है न कि कोई पहाड़ी पंजाबी या मुसलमान। हम सब जानते है कि किसी भी बदलाव के पहल से विघटन और विनाश को भी जन्म दिया जा सकता है इसलिए हमें इसकी तरफ सृजनात्मक तरीके से बढ़ना होगा। और परिवर्तन को नज़रंदाज़ करेंगे तो मूल समस्याएँ वहीँ रह जाएँगी, साथ में मानसिक, सामाजिक संतुलन बिगड़ेंगी और फिर पूरी व्यवस्था बाधित हो जाएगी। एक सत्य यह भी है कि आर्थिक और सामाजिक जीवन की बदलती हुई परिस्थितियाँ पहाड़ियों को नए प्रदेशों के तरफ ले जा रही है। यह एक प्रकार का सम्मिश्रण और समन्वय है जिसका हमें आशावादी होकर स्वागत करना चाहिए, क्यूँकी अपने आप में यह एक सांस्कृतिक सृजन और विकास के नए रास्ते खोल रही है।
अंततः हमें यह स्मरण रहना चाहिए कि पहाड़ों में पारस्परिक लोक-संस्कृति का आधार प्रकृति के प्रति लोक-समुदाय का विशेष रुझान रहा है; इसलिए हमें पर्वतीय संस्कृति, सभ्यता और सम्पदाओं के जीवनदायी तत्वों के सरंक्षण हेतु अपने प्रयास को पूर्ण रूप से सक्रिय और कारगर बनाना होगा। और इसके लिए हमें रूमानी नज़रिए से नहीं बल्कि हकीकत की ज़मीं पर एकजुट होना होगा। इस प्रयास को पहाड़ी नगरों के अलावा पहाड़ी ग्राम-स्तर पर भी करना होगा, जहाँ लोक-जनसमुदाय का असली में निवास होता है। क्यूँकी जब तक पहाड़ी लोक-संस्कृति के उत्थान की कोशिश ग्राम-स्तर पर नहीं होगी और जन-जीवन के विकास-क्रम में सजीव तौर पर नही जुड़ेंगे, तब तक शहर-केन्द्रित योजनाएँ या तो अधूरी रह जाएँगी या फिर बनावटी साबित हो जाएगी।
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