Encashing Death!

Encashing Death... मौत की मार्केटिंग।


जनाज़े में फर्क इस बात से पड़ता है कि शामिल लोगों में से किसने मय्यत के भार को एहसास किया और जनाज़े के पीछे भींड़ कितनी थी। ज़ाहिर है, चाहने वालों के साथ फॉर्मेलिटी निभाने के लिए लोग सफ़ेद कुर्ते में जब अंदर से कुढ़ते हुए कुतरी हुई आत्मा को लिए आगे बढ़ते हैं तो उन्हें पता होता है कि अगले १३ दिन तक तारीफ़ की उल्टी माला ऐसी फेरनी है कि उसकी आत्मा भी किसी डिवाइस में आकर कहे की "का गुरु, तुम तो छा गए हो सारा सोशल मीडिया पर!"


लेकिन मजाल है कि माला फेरने वाला खुद वैसे ही मरकर मिसाल बने!


बहरहाल, मौत का जश्न कैसे मनाना चाहिए, ये अगर देखना है तो सुशांत सिंह राजपूत की नयी फिल्म के प्रमोशन और सोशल विलाप को नज़र से देखकर अंदाज़ा लगा लीजिये कि मरने के बाद तारीफें कैसी और किनसे निकलेंगी! फिल्म को सिम्पथी के चक्कर में ऐसी रेटिंग मिली है कि कास्टिंग डायरेक्टर से बने फिल्म डायरेक्टर अब ज़िन्दगी भर इस रेटिंग की रोटी करोड़ों में खायेंगे। क्या इससे सुशांत के करियर को फायदा होगा? क्या वो इतना बुरा एक्टर था कि उसे आज इतनी सिम्पथी दी जा रही है? सपोर्ट करने की कवायद यहाँ ऐसी है कि, यहाँ ये नहीं देखते कि किसको सपोर्ट कब करना है, या किसको किस वजह से सपोर्ट कर रहे हैं। सभी अपने सफ़ेद कुर्ते के अंदर जानते हैं कि फिल्म औसत दर्जे की है लेकिन डायरेक्टर को दोष नहीं दे सकते।
क्यों? सुशांत की आत्मा अशांत हो जाएगी?
अरे घंटा!
तुम्हें ये जब फर्क ही नहीं पड़ता कि पायरेसी की मलाई चाटते हुए किसका नुक्सान हुआ है, तो ये दो कौड़ी की संवेदना को ९.८ की रेटिंग मत बनाओ। इसके पहले उसी एक्टर के फिल्म को क्यों इग्नोर किया था? बुरी फिल्म थी न? तो फिर ये दोगलापन क्यों निकल रहा है? पता है न कि सुरक्षित रहने के लिए घर में रहना ज़रूरी है? तो इसलिए अपने दोगलेपन को उसी सफ़ेद कुर्ते के अंदर अपने अंदर के कोरोना को कुतरने दीजिये ताकि अगली बार कोई सुसाइड करे तो आपको याद रहे कि आपको क्या करना है।


फिल्म के डायरेक्टर से लेकर स्ट्रीमिंग प्लेटफार्म तक ने, किसी और की मौत को अपना प्रमोशनल टूल बनाया। इससे पता चलता है कि आपदा में कैसे अवसर को कैश करना है। क्योंकि चमड़ी जाये तो जाए ठाकुर, पर दमड़ी ना जाए! मजे की बात है कि अभी तक किसी मीडिया हाउस ने मरे हुए के अधमरे परिवार से नहीं पूछा कि फिल्म देखकर कैसा लगा। मीडिया को तो अच्छा ही लगेगा और परिवार को जैसा भी लगे, उन्हें तो प्रोग्रेसिव मैसेज ही देना होगा। लेकिन इस फिल्म से अगर किसी का फायदा होगा तो सिर्फ बकवास डायरेक्टर का, जबकि मेहनत इसमें डायलॉग राइटर की है। सबसे ज़्यादा बेहतरीन संवाद भी फीमेल के हिस्से में है, कहानी का हर किरदार अपने आप में कितनी सारी पॉजिटिविटी लिए हुए है लेकिन, फिल्म वो कमाल नहीं करती। सुशांत भी आधे वक़्त शाहरुख़ की कॉपी करते और अपने डायलॉग को आधा हजम करते हुए से लगते हैं। इनफैक्ट फिल्म का सबसे ख़ास और ज़रूरी डायलॉग तो सैफ़ के मुँह से निकलता है, लेकिन अभी हम सब सिम्पथी में इतने गुम हैं कि पता ही नहीं उसका फायदा कौन उठा रहा है। यही दर्द और बिछड़न, सुशांत की हर फिल्म में है, लेकिन हमने हर बार कद्र नहीं की। ऐसी कई बेहतरीन फिल्में अभी हाल-फिलहाल में भी आयी हैं, उनकी रेटिंग कितनी है? उनमें से किसी फिल्म के किसी एक्टर की तारीफ़ कहीं मिली? यहीं हम हारते हैं... और दुबारा तब, जब कोई किसी के मौत की मार्केटिंग कर के फायदा उठा रहा होता है।



आप में से बहुतों को लगेगा कि मेरी सुशांत से कोई दुश्मनी है क्या या किसी की ज़िन्दगी की आखरी फिल्म है तो उसके लिए इस बार तो कुछ नेगेटिव नहीं लिखना चाहिए। सच यही है कि किसी के जाने के बाद कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन उसके चक्कर में किसी और को तारीफ़ का हकदार नहीं बना सकता। ये फिल्म अच्छी है सिर्फ एक्टिंग और डायलॉग के वजह से, नहीं तो ये भी फिल्म हम सब मिलकर फ्लॉप घोषित कर देते और अगली फिल्म से उम्मीद लगा कर कहीं गुम रहते। किसी के भी मरने के बाद उसके शोक सन्देश में तारीफें पढ़ना बंद कर दीजिये क्योंकि तारीफों से उम्र बढ़ती तो है लेकिन ज़िंदा इंसानों की, लाश का क्या होता है... ये आपको इससे पैसे कमाने वाले बता देंगे।

~अभिलेख

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