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Showing posts from August, 2016

काश और कश

काश और कश काश के मारे, अक्सर कश के सहारे मिलेंगे। कुछ घुटन अंदर और कुछ बाहर रखने की जद्दोजहद में अपने ऊंघते झुंझुलाहट को धुएँ की शक्ल में देखते हैं। 2 ऊँगली जैसे ज़िन्दगी और मौ...

बूँद

बूँद। गीले पत्तों पर थिरक कर जो बूँद गिरी थी अभी अभी, ज़मीं पर कहीं खो गयी थी। देखा तो पत्तों ने भी, बारिश और और उस मिटटी ने भी, लेकिन किसी ने कुछ बताया नहीं। हर ओर बरसात का शोर और उ...

कहना और जताना।

कहना और जताना। कहने और जताने के बीच में अक्सर एक फासला रह जाता है। फासला.. एक ठहराव कह सकते है जो परस्पर बना रहता है और जो उससे गुज़रते हैं उनको वह क्षण भर का लगता है। कहना सरल तो ...