Sky is the limit... A myth!
क्या वाक़ई ये किसी हद की सीमा है? आसमान की ऊँचाई पर पहुँच कर सबसे पहले तो ऑक्सीजन की ज़रूरत पड़ेगी तो फिर ऐसी ऊँचाई किस काम की जहाँ दम घुटने लगे? उसपर से 'पुष्पिंदर' को ढोने का अलग से सिरदर्द! आपका 'मैनी' अपना ऑक्सीजन ढोयेगा या आपका? इसलिए मुझे लगता है ऐसी इंस्पायरिंग लाइन को अब साइड कर देना चाहिए। जब 'नई एडुकेशन पॉलिसी' खुद को 34 साल ले सकती है बदलने में तो ऐसे बेमतलब के फ्रेज नहीं बदलना चाहिए? ना तो ये बताया गया है की आसमान के किस परत को छूना है और ना ही किसी परत पर रुकना का कोई ठिकाना है कि आदमी ये सोचे कि रुकना कहाँ है! अगर खुद ही तय करना है तो फिर ऐसे सफर के लिए निकलना क्यों? वैसे आदमी और आसमान से ये भी ध्यान आता है कि आसमान छूने वाले तो गिने-चुने एस्ट्रोनॉट ही होते हैं। कुछ हद तक लड़ाकू विमान चालक भी, हाँ अपने रफएल / राफेल वाले भी। फ्लाइट में बैठकर तो छूने को मिलता नहीं, उसपर भी फ्लाइट-बाला कभी पर्दा गिराओ और कभी उठाओ लगाए रहती है। कभी-कभी तो लगता है धीरे-से फेवीक्विक लगा दूँ ताकि झंझट खत्म हो। लेकिन मुद्दे की बात ये है कि आपको आसमान छूने को नहीं मिलता है। हा...